बरगद का पेड़
(my poem written in 1975 when i was abt 21)
बरगद का पेड़ तो बूढा ही पैदा हुआ था
वह सदा झुका रहा है
हथेलियां जमीं पर टिकि रही
सूरज के ताप से झुलसता
ताउम्र चौपाये सा पीठ झुकाये खड़ा रहा
वह नासमझ समझता था कि
सूर्य की किरणें तो जीवनदायिनी हैं।
एक दिन हठात्
उसकी मुलाकात हुई
हकीम शफाखाना से
साथ में थी खोयी हुई जवानी
वापस दिलाने का वादा।
उसके वादे से आश्वस्त
जैसे ही हथेलियां जमीन से उठाईं
वह ह्हरहरा कर ढ़ेर हो गया।
वह भूल गया था कि
उसने तो जवानी कभी खोई ही नहीं थी
वह तो बुढ़ा ही पैदा हुआ था
वह यह भी नहीं जानता था कि
खुद हकीम भी सूरजमुखी ही था
और माँ पृथ्वी
निःस्पन्द थी
क्योंकि बेटा कमाउं नहीं था
Thursday, May 31, 2007
Proletariat
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1 comments:
कुलदीप जी, बहुत अच्छा लिखा था आपने.
क्या आजकल भी इतना ही अच्छा लिख सकोगे?
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