Sunday, May 13, 2007

Gandi and Bhishma Pitamah

गाँधीजी एवम् भीष्म पितामह

गाँधीजी भारतीय राजनीति के पितामह स्वरुप या राष्ट्रवादी राजनीतिक किले के बिम्ब थे। गाँधी जी सभी वर्गों के लिये ठीक उसी तरह आदर्श थे, जिस तरह भीष्म पितामह पाण्ड़वों एवं कौरवों दोनों के आराध्य थे। इक्कीस वर्ष दक्षिण अफ़्रीका में रहने के बाद, गाँधीजी की भारत की राजनीतिक यात्रा का आरम्भ काग्रेंस पार्टी के झण्ड़े तले जरुर हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने अपने आप को औपचारिक रुप से congress party से अलग कर लिया था एवं पूरे देश के नेता बन गये थे।
गाँधीजी काग्रेंस पार्टी में रहते हुए भी काग्रेंसी नेताओं की सत्ता लोलुपता से उतने ही दु:खी थे, जितने भीष्म पितामह कौरव दल में रहते हुए भी दुर्योधन की महत्वाकांक्षाओं से दु:खी थे। इसके बावजूद दोनों ने सत्ता लोलुपों का साथ दिया। जिस तरह भीष्म पितामह नें राष्ट्र विभाजन को स्वीकृति दे दुर्योधन की महत्वाकांक्षा के सामने घुटने टेके ,उसी तरह जब भारत के विभाजन के सन्दर्भ में कांगेस की बैठक हो रही थी, गाँधीजी उस सभा में मौन धारण किये हुए थे। दोनो अपनी इच्छाओं के विरुद्ध देश के विभाजन के मूक दर्शक बन कर रह गये। दोनो ही क्रमश: नेहरू व जिन्ना की महत्वाकांक्षाओं से हारे। “वीर भोग्ये वसुंधरा” या पौरुष के विचार से अर्जुन या कर्ण को ही सत्ता मिलनी चाहिये थी। गांधीजी ने भी अगर जाहिर तौर पर नेहरू के बजाय सरदार पटेल को देश के नेतृत्व के लिये चुना होता तो निःस्सन्देह देश का इतिहास काफ़ी भिन्न होता।
गांधी जी का विवादित ब्रह्मचर्य और भीष्म की ब्रह्मचर्य की भीष्म प्रतिज्ञा दोनो ही निरर्थक थे। गांधी जी के पिता के देहान्त के समय का अवसाद उनके पूरे जीवन पर भारी था,और एक दिन इसी अवसाद ने उन्हें ब्रह्मचर्य का व्रत लेने के लिये मजबूर कर दिया। ब्रह्मचर्य को इतना महत्व देना दोनो के लिये एक कमजोरी क प्रतीक था न कि पौरुष क।
भीष्म पितामह ने जहां भूलस्वरुप युधिष्ठिर की द्यूतक्रीड़ा ,शकुनि का कपट, लाक्षागृह के षडयंत्र को नजरन्दाज किया वहीं गांधी जी का पाकिस्तान के तमाम नापाक कारनामों यथा काश्मीर में युद्ध के बावजूद पाकिस्तान को 56 करोड़ दिलवाने हेतू अनशन पर बैठ जाना उससे भी बड़ी भूल थी।
दोनों की हत्याओं के पीछे दो मुखौटों का हाथ था। जहां भीष्म को स्वेच्छा मृत्यु का वरदान था,मृत्यु उनके पाँव के पास उनकी आज्ञा की प्रतीक्षारत खड़ी रही। वहीं गांधी का व्यक्तित्व इतना वृहत् था कि किसी भी बन्दूक की गोली से उनकी हत्या असम्भव थी।
भीष्म पितामह की मृत्यु शरशैया पर होती है। ये वाण कितने भी नुकीले रहें हों वे उनके उपर आराम से लेटे हुए थे। मृत्यु उनके पाँव के पास उनकी आज्ञा की प्रतिक्षा में खड़ी थी। विभाजन के स्वभाविक चरोमोत्कर्ष महाभारत की समाप्ति पर ही मृत्यु को आज्ञा मिलती है। उनके शरीर को लहुलुहान करने वाले वाण अर्जुन के नहीं वरन् उनकी अपनी नपुंसकता के थे। धृतराष्ट्र के पुत्र मोह का विरोध नहीं करना,अपने वृद्ध पिता की व्याभिचारिता के लिये पौरुष का त्याग कर, अपनी चेतना का परित्याग, एक व्यक्ति की गलत इच्छाओं के सम्मान हेतू अपना एवं अपने राज्य के भविष्य को गलत दिशा देना,अम्बा का अपहरण एवं परित्याग, द्रौपदी के चीर हरण का प्रतिरोध नहीं करना आदि चिन्ह पौरुष के नहीं कहे जा सकते थे।
विभाजन के फलस्वरुप हुए दंगों में पश्चिमी भारत में नर संहार पुर्वी भारत की तुलना में कम से कम दस गुना हुआ। नोआखली में महज एक पखवाड़े में शान्ति बहाल हो चुकी थी। इस समय गांधी जी का दीर्घकालीन कलकत्ता प्रवास कुछ वैसा ही था जैसा भीष्म पितामह का द्रौपदी का चीरहरण के समय सभा में मूक उपस्थित रहना। यहां एक द्रौपदी का चीर हरण हुआ था वहां पश्चिमी भारत में लाखों द्रौपदीयों का चीर हरण हो रहा था। लेकिन गांधी जी उनकी तरफ पीठ कर नोआखली में बैठे रहे।
नाथुराम गोडसे या कोई भी अन्य व्यक्ति पिस्तौल से गांधी जी हत्या नहीं कर सकता था।
गांधी जी कि हत्या भले ही गोडसे ने 1948 में की हो,गांधीवाद की हत्या की प्रक्रिया विभाजन की स्वीकृति के साथ ही हो गई थी। जिस तरह तुलसी दास कहते हैं कि “राम का नाम,राम से कहीं बड़ा था” उसी तरह गांधी एक व्यक्ति से उपर एक विचारधारा का नाम था। उनकी हत्या उनके अपने नामधारीयों ने की। जिस तरह भीष्म पितामह की हत्या उनके अपने पोते अर्जुन के हाथों हुई, उसी तरह गांधी जी की हत्या भी उनके ही राजनीतिज्ञ वंशजों ने ही की है। राजघाट पर बनी हुई समाधि तो सिर्फ एक प्रतीक मत्र है। उनकी हत्या भारत के हर गांव हर शहर में हुई है।
जहां गांधीजी की समुचित विचारधारा का केन्द्र भारतीय ग्रमीण समाज था वहीं उनके राजनीतिक पुत्र नेहरुजी पक्के देशप्रेमी होते हुए भी एक अभिजात्य (elitist) सोच से ग्रसित थे। जहां गांधी जी की प्राथमिकता गांव के शौचालयों की थी वहीं नेहरु जी की प्रधान मन्त्री के रुप में पहली मानसिक संरचना विदेशी मेहमानों हेतू अशोक होटल की थी। अशोक होटल का निर्माण भारत के drawing room के स्वरुप किया गया। ये अर्जुन के तरकश का पहला तीर था, जिसने भीष्म स्वरुप गांधी को बिंधा। हाल में दिये गये एक भाषण में यह कहा गया है कि, “नेहरु जी भारत पर राज्य करने वाले अंतिम अंग्रेज थे।“ यह संवाद अपनी पूरी भंगिमाओं के साथ अग्राह्य होते हुए भी कई अर्थों में एक ऐतिहासिक सत्य है।
भारत के विभाजन के लिये अगर जिन्ना मुख्य दोषी है तो नेहरु जी की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के वजूद को नकारा नहीं जा सकता । पराकाष्ठा स्वरुप आज तो परिस्थिति यह है कि
बापु तेरे चरखे पर , खद्दरधारी आज कात रहें हैं
सोने के धागे
सन् 1937 के चुनाव के पश्चात महात्मा गांधी ने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा था कि , “आज सत्ता में बैठे हुए लोगों के भ्रष्ट आचरण को देख कर मैं भारत के भविष्य के प्रति सशंकित हूँ।” उसी समय आवश्यकता थी एक समानान्तर भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आन्दोलन की। गलत महत्वाकांक्षाओं की हत्या ही समुचित समाधान है।
भीष्म पितामह भी महाभारत के प्रारम्भ में अपनी भूल स्वीकार करते हुए कहते हैं कि “ मुझे विभाजन स्वीकार नहीं करना चाहिये था। यह युद्ध उसी समय छेड़ देना चाहिये था।
व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का समाधान विभाजन नहीं युद्ध है। अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं जीवित रहीं तो विभाजन के पश्चात भी महाभारत ही होगा।”
भातर पाक के चार युद्ध पांच हजार वर्ष के पश्चात भी उस कथन को प्रमाणित ही करते हैं।
फिर भी निःशंक दोनो ही महापुरुष, युगावतार थे। (My musings here are inspired by Shashi’s The Great Indian Novel”

1 comment:

Kb Rastogi said...

bahut hi sundar vishleshan