यात्रा
मैं आखिरकार घर से निकल ही पड़ा
मेरा यह सफ़र मुझको
मुझको मुझ तक ले जाने को था
ड्गर अनजानी
मंजिल अनदेखी,
सिर्फ़ एक किरण का दिशा संकेत
ओर मैं पुर्णता की आदिम इच्छा का कम्पास ले
आखिरकार घर से निकल ही पड़ा।
इस यात्रा में किसी हमसफ़र के लिये
कहीं कोई जगह नहीं है।
मेरे साथ है
पुर्णता की प्रबलता इच्छा
एक उत्कंठा, ओर मेरा आधा मैं।
पूर्णता तो यात्रा की समाप्ति का पर्याय ही है।
इसीलिये इस रास्ते में,
वापसी का कहीं कोई पदचिन्ह नहीं है।
जो भी गया कभी लौट कर नहीं आया।
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1 comments:
सुन्दर प्रयास है।अच्छी रचना है।
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