Sunday, August 16, 2015

THE INCONVENIENT TRUTH


सत्यम् ब्रुयात , प्रियम् ब्रुयात, अप्रिय सत्यम् ब्रुयात। 
This inadvertently means that The Inconvenient Truths need not be spoken. Geeta has two distinct words. श्रेयस and  प्रेयस I The word श्रेयस means what is GOOD and Credible for the people and प्रेयस means what is convenient and or Palatable.
Can the Convenience gain immediacy over Credibility and or Truth.
A news from Neighbouring country i.e. Nepal has made me indulge in this drivel. In Nepal about 80% of the Muslims have expressed their desire that Nepal should opt for a Hindu Rashtra concept and reject secularism.  The word SECULARISM means that matters of Religion must not influence issues of State i.e. Governance.
Religion being a personal affair should never ideally be a subject of state. Yet the Muslims in Nepal have shown pragmatism and dared to speak out “The Inconvenient Truth” i.e.  the अप्रिय सत्यम्  or is it a mere submission to Majoritarianism.
Ideally Secularism must hold sway over any form of State’s allegiance to a subject that is private between an individual and his/her God. It is a cry from a child directed to his/her mother seeking HIS attention.  No reason for state to get itself involved in such private matters.
Yet state matters need a Reality Check and not an idealistic drool.
India has three principal streams of religion vying for it’s people’s attention. Hinduism (that includes Sikkhism, Buddhism and Jainism) followed by approx. 82%, Islam (Shia,Sunni,Ahmedias all included) approx 14% , Christians about 3% and smaller sects like Parsis, Jews etc., make up the rest.
When we practice secularism, we treat all religions  at par and give equal importance to each of them. We have EID and Christmas celebrated as Public Holidays. 
If state is declaring Holidays on religious festivals it can not be ideally said that State is not involving itself in the matters of religion. Ideally State may give 10 or 15 optional Festival Holidays and allow each individual to avail holiday as per his option. No compulsory holiday on Diwali or Eid. Indian style of secularism means giving equal importance to all religions and not ignoring any. Christians with a miniscule population of 2 to 3% have several designated holidays under N I Act.
In the matters of reality check, let us examine the basic tenets of each and try to understand where do they support the Nationalism of it’s nationals.
Whereas Christianity:: Pope declared while traveling in India that “Conversion is a basic tenet of Christianity”. I have seen several Christian Dharm gurus on TV emphasizing that indeed there can not be any restriction on Conversion as it would mean a restriction on one’s conscience.

Basic Tenets of Islam:: Shahada and Caliphate

"There is no god but God (and) Muhammad is the messenger of God."
Caliphate again another fundamental concept of Islam is alien to Modern society and concepts of Nationalism.
Hinduism:: " जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"  depicts that Hinduism is close to Nationalism. The basic tenet अहम् ब्रह्मास्मि means ascendancy to Godhood by good deeds. No room for sectarianism unlike other two religions.
THENCE THE INCONVENIENT TRUTH
My belief a TRUE HINDU Rashtra would have Real Secularism as it’s core philosophy instead of the current pseudo secularism, wherein Christian NGOs peddle conversion and Islam that is competing for establishing of a Caliphate.

Thursday, July 16, 2015

बीतता कौन है।



बीतता कौन है
रीतता कौन है
समय या मैं
प्राचीन काल में सूर्य का रथ,
जब समय के चक्र के साथ संलग्न था।
तब सूर्य भी पृथ्वी के चारों ओर
वृत्ताकार घूमने में मग्न था।
हां, तब समय ही बीतता था।
एक दिवस का समय
सूर्य का पृथ्वी के चारों ओर,
वृत्ताकार घूमने में लगता प्रातीत होता।
लेकिन आज के नये परिप्रेक्ष्य में
जब पृथ्वी घूमती है
और सूर्य स्थिर है
तब सूर्य के साथ संलग्न
समय का चक्र भी तो
गतिहीन हो ही जाता है।
हां, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बन्धा
मैं निरन्तर घूमता रहता हूं,

किसी इन्द्रधनुषी आभा से मण्डित
किसी सूर्य रुपेण मरीचिका
के Orbit की परिधि में।
अतएव अब बीतना भी मेरा है 
और रीतना भी मेरा है।
अब इस बीतने और रीतने में
व्यक्तित्व का निरन्तर क्षीण होना तो लाजिमी है।
बीतते बीतते या रीतते रीतते,
मैं शायद व्यतीत हो
वर्तमान से भूत हो जाउंगा
समय अपनी जगह पर स्थिर
तब भी मेरे वर्तमान से भूत हो जाने की
यात्रा का साक्ष्य एवं दर्शक होगा।
कहते हैं व्यक्ति मृत्योपरान्त भूत हो जाता है।
मेरे यूधिष्ठीर सम  सशरीर भूत होने का साक्ष्य यह समय
तब भी ठीक यहीं खड़ा  
अक्षुण्ण जुगाली करता मिलेगा।

Sunday, August 31, 2014

Yudhishthir





मेरा आस्तित्व तो
मेरे ईश्वर की ही अभिव्यक्ति है
और मुझे जिन्दा ही लौटना है
अपने ईश्वर के पास

मुझे भी चाहिये है स्वर्ग,
लेकिन सशरीर
तकि अपने ये सारे अनुभव में
अपनी फेसबुक की वाल पर
सबके साथ शेयर कर पाऊं
जानता हूं कि ईश्वर के घर का पता
धर्म की गली से होकर गुजरता है
लेकिन मुश्किल में हूं
क्योंकि धर्म ने अब अपना
स्थायी पता या Permanent address खो दिया है
बेघर हो, धर्म आज
ऊंची उंची गुम्बदों वाले घरों में,
बड़े बड़े ठेकेदारों के घरों में,
नजरबन्द है 

मेरा धर्म जो सत्य में बसता था
वह धर्म जो
स्वयं अपनी स्थापना को दांव पर लगा
नरो वा कुन्जरो कहता था
की जुबान पर सोने के ताले लग गये हैं।
नहीं यह मेरा धर्म नहीं
ऐयारी चोगे मे यह एक नया धर्म है
एक छद्म धर्म आया है इस हाट में
इसे जन्म दिया है
एक ठग व कुछ मूर्खों के अभिसार ने
यह धर्म सिर्फ भाल पर सजता है
पेट की जरूरत नहीं समझता है
ठग की जीविका का अवलम्ब बन
भक्त को मृत्योपरान्त के स्वर्ग का अक्स दिखाता है।
मेरे जीवनकाल के coordinates में
न मृत्यु का कोई घर है
न मृत्योपरान्त मिलने वाली 108 अप्सराओं के संसर्ग की
कोई अभिलाषा
मेरा पुरा धर्म
मेरा सारा सत्य
जिन्दगी का , भौतिक शरीर का , इसी लोक का मुखापेक्षी है।  

Wednesday, May 07, 2014

Elections



चुनाव की मर्यादा है कि
मैं मतदान करूं , और
स्वेच्छा से अपने अधिकारों का मुख्तार नामा
एक अन्य को सुपुर्द कर दूं
और फिर उस मुख्तारनामे की बदौलत
मेरे जिन्दगी के सारे अहम् निर्णयों पर
मेरे सारे अधिकार, आवश्यकताओं व कर्त्तव्यों सम्बन्धी फैसलों
पर उस अन्य का हक् हो रहेगा।
मेरी त्रासदी है कि
मेरी आंखें अभी खुली  हैं
इनपर किसी Cataract ने दखल भी नहीं दी है।
स्पष्ट देख पाने की त्रासदी को झेलते हुये
बहुत ही कठिन बन पड़ रहा है
अ व ब के मध्य चुनने में ।
नहीं चुन कर
तटस्थ रहने की विलासिता का अधिकार
भी कहां है मेरे पास ,
तटस्थ रह कर भी मैं गणतन्त्र के साधारण
नियमों का अपराधी माना जाउंगा और
समय लिखेगा मेरा भी अपराध।
या शायद औने पौने में बेच दूं
मेरे इस चुनने के अधिकार को।
एक दिन के लिये बी पी एल की रेखा से उपर आने के
शुल्क के एवज में
अपने हाथों अपने अगले पांच वर्ष के भविष्य को
दफन कर दूं।
ए वी एम पर टंके सारे नाम
उन व्यक्तियों  के हैं जिन्होंने स्वयं अपनी चेतना
बेचदी है , शक्ति के ठेले पे, सत्ता के मेले में , भीड़ के रेले में
क्या इन चेतना शून्य व्यक्तियों को
खुद मुख्तारी सौंपने का नाम ही चुनाव है।