मैं कई सालों से
गुमशुदा लोगों के शहर
में रह रहा हूँ ।
यह उन लोगों का शहर है
जो अपने परिवार से
समाज से
सारे अपनों से गुमशुदा
विक्षिप्त इस शहर में रहने आ गये हैं।
इनके लापता विज्ञापनों के चित्र तो
छपे थे
लेकिन उन अधूरे, धुंधले चित्रों के
चेहरे नहीं होते
उनसे
उन्हें ढुंढ पाना तो कतई है असम्भव
ये अपने परिचय के सारे मानक
यथा नाम, जाति,धर्म, साकिन
अतीत के गर्भ में
कब का खो चुके हैं
न इनका कोइ भूत है
न भविष्य
इनकी मृत्यु !
ये चलते चलते गिर जाते हैं
और मर जाते हैं
मरणोपरान्त बिना किसी संस्कार के
तुरन्त ही शव गायब भी हो जाते हैं
इधर गिरे उधर लाश धुंआ हुई
बिना किसी परिचय के
इनका शोक समारोह भी नहीं सम्भव
मैं जब पुछता हूं कि
कौन मरा था
लोग विष्मय से मुझे देखते हैं।
जैसे कोई मरा ही न हो।
हां इन गुमशुदा अपरि्चित लोगों के शहर में
मुझे परिचय का मानक जरुर मिल गया है।
लोग मुझे पागल समझ्ते हैं।
Sunday, July 08, 2007
A Metropolis city
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