एक दिन या शायद एक रात
मैं अचानक उससे टकरा गया
पलट कर देखा
कुछ बिसरा सा पहचाना सा चेहरा दिखा
मैंने पुछा
क्या तुम वही हो
जिसकी दहलीज पर मेरी
मेरी मां ने ताउम्र दीप जलाये
या वह
जिसपर मेरे पिता ने अपने
अडिग विश्वास का लंगर डाल रखा था।
या वह
जिसका आस्तित्व एक कमजोर आदमी की बैशाखी सा।
या वह जिसका डर दिखला कर
मन्दिर का पुजारी
लोगों से पैसे ऐंठ अपनी जीविका चलाता था।
एक हल्की सी मुस्कान
एक मद्धिम सा स्वर
मेरे कानों में गुंजा
नहीं
ये सारी परिभाषायें
लोगों के अपने अपने दृष्टि भ्रम हैं।
मैं तो इन सबसे परे हूं ।
मुझे जानने के लिये पहले खुद को जानो
जिस दिन खुद को पहचान पाओगे।
उसी दिन मुझे भी जान जाओगे ।
मेरी उलझन देख
वह प्रतिभुति मुस्कराई
यह कठिन है
तो खुद को भुल जाओ
कबीर सा खुद को पहचानो
या मीरा सा खुद को भुल जाओ
इन के बीच की परिस्थिति में तो यार
मुझे जानने के तुम्हारे सारे प्रयत्न हैं बेकार।
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