मैं और मैं
मैं जानता हूं कि
मैं, मैं नहीं।
मैं वह हूं
फिर भी
मैं अपने
अहम् के दरवाजे के इस तरफ खड़ा
अपने स्थूल मैं, में
स्थिर हो, रह गया हूं ।
मेरी इस स्थूल से सूक्ष्म
की यात्रा में
मुख्य अड़चन मेरे सुशुप्त पन की है
मैं आजतक
तमाम दिशा संकेतों से अनभिज्ञ
खुद अपने ही अहम् की उंगली थामे
एक वृत्ताकार दिशा में
निरन्तर चल रहा हूं
यह वृत्ताकार यात्रा तो
कालातित, अनादि और अनन्त है
और इस वृत्ताकार यात्रा में
दिन ढ़ले तक की तय दूरी
सदा शून्य ही होती है
अब शून्य displacement के अन्तर्गत
ढेर सारी उर्जा के क्षय पश्चात भी
Work done की मात्रा
तो शून्य ही रहेगी।
हां इन्तज़ार है उस क्षण का
जब मेरी अहम् की खुमारी टूटेगी
और मैं अपने उस रुप से रुबरु हो
Displacement का पहला कदम
बढ़ा पाउंगा
हां खुली आंखों को ही
गन्तव्य भी होगा परिलक्षित
और तब अनावृत्त दिशा संकेत
मार्ग दर्शक बन
Energy conservation के नियमों की परीधि में
भक्ति और ज्ञान को शक्ति में बदल देंगे
मेरी यात्रा
मेरी यात्रा का अन्तिम पड़ाव
तो तत् त्वम असि है
जहां परमाणुवीय E = MC² सिद्धान्तानुसार
मेरा पुरा का पुरा मैं, ही
शुद्ध उर्जा में रुपान्तरित में हो जायेगा।
Wednesday, June 20, 2007
Me
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2 comments:
जीवन
काश जीवन एक रेखा होती
एक बिन्दू से दूसरे बिन्दू तक
एक निश्चित दिशा होती
हर कदम कुछ आगे बड़ते
कुछ दूरी हर दिन तय होती
पर हर पल यहाँ...
एक नयी दिशा....
गोल घूमती दुनिया...
प्रदक्षिना...
और परीक्रमा...
लट्टू की तरह....
अपनी दुरी में घूम...
आगे कभी पीछे...
गोल कक्षा में झूम..
सुन्न...... सुस्त...स्तब्ध....
गती..
संगती....
स्नेह ...समृद्घी...
एक भ्रम....
मौसम…
पहर….
बनते....बिगड़ते....
गाम...शहर...
एक क्रम....
कहाँ.....???
..आदित्य.....
..चैतन्य.....
.....परम.....????
Beji comments from ppl like u are very important
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