Thursday, April 19, 2007

Godhara

गोधरा हिरोशिमा की नाईं
हठात् विश्व के नक्शे पे आ गया
एक गुमनाम सा कस्बा
इन्सानियत की कब्रगाह बन
सुर्खियों में था
यह बात और थी कि
उन सुर्खियों को सुर्ख रंग
इन्सानों के लहू से ही मिला था

अब मुझ जैसे समर्थ लोगों को
प्रतिशोध में कुछ और शहरों के नाम
सुर्खियों में लाने थे
फिर से हुई इन्सानियत की हत्या
फिर कुछ और लहू बहा
अब कुछ और शहरों के नाम
सुर्खियों में थे
मैने लूटा दुकानों को
इस बात से बेखबर
कि अपनी पांच हज़ार साल की धरोहर
उसी दहलीज़ पर मैं खुद
लूटा कर आया हूं
हां वही सम्पदा जो मुझे
राम बुद्ध औ गांधी से
विरासत में मिलि थी
एक छण में गवां कर आया हूं।
हां मैं अब अपना सब कुछ लूटा
भेड़िये में तबदील हो गया था
समर्थ को नहीं दोष गुनगुनाता
कुछ और शिकार तलाश रहा था
इन्सानियत अब जर्द औ रक्तविहीन हो
हाशिये पे पंहुच चुकी थी

वसुधैव कुटुम्बकम का मन्त्र
अब बासी हो चला था
राम का वर्गीकरण कर
उसका धनुष अपने हाथों में ले
मैं, हाँ अब मैं ही
राम की रक्षा कर रहा था


Godhra like Hiroshima
All of a sudden Got Identified on the World Map
An Unknown town was in headlines
By turning into a graveyard of humanity
Although the vermillion hue of the headline
Was obtained from human blood alone
Now it was the turn of certain other
Strong men such as me
To bring names of certain other towns in headlines
Once Again Humanity was murdered
Some more blood was shed
And Few more towns
Hit the headlines

I Robbed shops
Unaware of The Fact
That I had Lost My Five Thousand Years
Estate In The bargain
Yes the Same Estate that I had got as inheritance
From Ram ,Buddha and Gandhi
I lost at the same doorstep in a second

Now Bereft Of everything

I had Metamorphosised into A Wolf
And Pleading Might is Right
I was Looking For a Fresh Prey
The Humanity had become Anemic and Pale
And had become marginalized
The Concept of universal Brotherhood
Had Become Stale
Now I Had segmented Ram
Taken his bow in my hand
And me , yes little me
Had Become the protector of Ram

1 comment:

multisubj yb said...

The poems are readable. Thanks.