Thursday, July 16, 2009

Meri Betiya

मेरे सारे ब्लाग्स सारे जहां के विषय में थे।कभी राजनीति पर कभी धर्म पर ।
आज कुछ मानवीय सम्बन्धों पर लिखने की इच्छा हुई।मैं एक Mid aged पचासोत्तर उम्र का मारवाड़ी व्यवसायी हूं। मैं आज उम्र के जिस पड़ाव पर हूं, उस पड़ाव पर मेरे प्रायः हमउम्र मित्रों के पुत्र वयस्क हो चुके हैं ,एवं पारिवारिक व्यसाय में रत हैं।
इन समीकरणों मे अक्सर एक असंतोष देखने में आता है। कहीं पिता को पुत्र पर पूरा भरोसा नहीं है एवं पुत्र पांच या दस वर्षों के बाद भी Learning License वाली driving ही कर रहें हैं। कहीं पुत्र परिवर्तन चाहते हैं एवं पिता अपने पुराने Tried एवं Proven मार्ग से हिलने को तैयार नहीं हैं।
कारण कुछ भी हों,सम्बन्ध अक्सर तनाव मय हैं।
यह सब देख कर अक्सर प्रतीत होता है कि मैं खुशकिस्मत हूं कि मेरे कोई बेटा नहीं है,सिर्फ दो बेटियाँ हैं। सिर्फ कहना गलत है। सिर्फ कहीं न कहीं न्यूनता का भाव प्रदर्धित करता करता है। यहां तो बाहूल्य का मौसम है।
प्रधान मन्त्री श्री मनमोहन सिहं ने भी कुछ ऐसे ही भाव व्यक्त किये थे ,जब उन्हों कहा था कि "वे खुशकिस्मत हैं कि उनकी तीन बेटियां हैं कोई बेटा नहीं है। अगर उनके कोई बेटा होता तो वो कभी भी प्रधान मन्त्री नहीं बन सकते"।
स्वाभाविक तौर पर मेरे ढेर सारे अनुभव हैं इन बेटियों के बचपन के, किशोरवस्था के आदि।
मुझसे किसी व्यक्ति ने एक दिन कहा कि आपने अपनी बेटियों को बेटों की तरह पाला है। मैं चौंक गया कि, कहां चूक हो गयी। मेरा उत्तर था कि भाई साहब मुझे तो एक ही तरह से पालना आता है। बताइये कहां चूक हो गयी। पता लगे तो अब भी भूल सुधार कर लूं।
एक और शुभचिन्तक हितैषी अतिथि के रुप में घर आये थे। कहने लगे कि बेचारे कुलदीप के तो सिर्फ बेटियां हैं।कोई बेटा नहीं है। मुझे और मेरी वहां उपस्थित बेटियों को बेचारा शब्द बहुत नागावार गुजरा। अब अतिथि धर्म के सामने बहुत कुछ कहा भी नहीं जा सकता। मैं उनकी भावनाओं को भी समझ रहा था। फिर भी मैंने तुरन्त बेचारा शब्द पर ऐतराज करते हुये पूछा कि मैं कहां से उन्हें से बेचारा नजर आगया।अच्छा खासा व्यसाय चला रहा हूं। कभी मांगने के लिये हाथ नहीं उठाया। मेरी बेटियां मुझे तो अति प्रिय हैं। तो कमी कहां और बेचारगी कहां है।
प्रश्न है एक सही व्यक्तित्व के निर्माण का। फिर चाहें वे इन्दिरा नूयी बनें या सहज गृहणी कोई फर्क नहीं पड़ता।

7 comments:

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

achchha laga aapke vichar jankar ...aage bhi is vishay me likhe jane ka intizar rahega.

KrRahul said...

Rightly said and very well expressed.

दोस्तों का आपके लिए "bichara" कहना samjha ja sakta hai - sab chahte hain ki unhe beta aur beti donon hon.

लड़के और पिता वाली बात का तो पता नहीं - पर लड़के ऐसा ही होते हैं :) एक उम्र होती है - जब उनमे अक्ल कम और हिम्मत ज्यादा होती है. एक उम्र में मै भी अपने पापा से झगड़ता था, पर वोह बहुत पहले की बात है - तब लड़कपन थी - teen age. फिर बाद में सब ठीक हो गया. पर हाँ, एक पिता के तरफ से देखिएं तो अभी भी पापा मेरी बहनों से ज्यादा घुले मिले हैं और मुझसे कम. बेटियाँ भी अपने पिता को ज्यादा प्यार करती हैं, बेटों की तुलना में. ऐसे ये बात अलग है की मेरी बहनें पापा पर "गयी" हैं - nature wise.

मनमोहन सिंह के बारे में अपने बहुत मजेदार बात कही. कितना सच है. पर एक बात और - जो भी नेहरु परिवार के भक्त हैं - ज्यादातर लोग प्रियंका को PM-in-Waiting देखना चाहते थे - राहुल को स्वाभाविक रूप से सेब बच्चा ही समझते हैं. पर इसे चाहे परिवार कहें या राजनीतिक आवश्यकता (ऐसा नै हो सकता), सोनिया G ने लड़के को भी आगे भेजा - लड़की को छुपाया या रोका एक तरह से.

पर हाँ, एक और कटु सत्य - जो पापा ने कहा था. दीदी की शादी के कई साल बाद - अब वोह अपने ससुराल - पति के घर - को अपने पापा के घर की तुलना में ज्यादा पसंद करने लगी थी :) तोह पापा ने कहा - ये भगवन ने लड़कियों को कैसा बनाया है. पर ऐसे ये जरुरी भी है - वरना वोह कभी अपने जन्म के घर को छोर कर नहीं जा पातीं. तो सब ठीक बनाया है भगवन ने.

बहुत अच्छी पोस्ट, मजा आया पढ़ कर...

kuldip said...

Dhanyavaada lovely ji.

संगीता पुरी said...

आज के युग में भी ऐसी मानसिकता .. बहुत तकलीफ होती है यह सब सुनकर देखकर .. बेटियां बेटों जैसा क्‍यूं नहीं पलेंगी .. क्‍या फर्क है आज दोनों में .. बस दिल की भोली होती हैं ये .. वरना हर क्षेत्र में तो आगे निकल रही हैं अब यही बेटिया ।

रंजन said...

सही कहा.. और सही किया बधाई..

Vibha Rani said...

yah bechara shabd to har betivale ko sunana padata hai. main bhi isaki apavad nahi. aapaki bat bahut achchhi lagi ki apne betiyon ko bachchon ki tarah pala, beto ya betiyon ki tarah nahi.

KrRahul said...

Actually kuchh log hain jo "बेटियों को बेटों की तरह" palte hain, aur ye galat hai. Mai aise kisi ko janta hun, unhone apne betiyon ko bachpan se sirf shirt-pant pahnaya, boy cut baal rakha, hamesha ladkon jaisi treatment di. Aur ye galat hai, baad me use psychological problems ho sakti hai.

Par jaisa apke dost ne kaha, us se aisa lagta hai ki apne apni betiyon ko woh sab freedom di jo normally log beton ko dete hain par betiyon ko bahut se rules se baandh kar rakhte hain. Ye theek tha.

Par hum sab ko samajhna chahiye, ki men aur women bahut different hote hain - nature wise aur approach wise. Kisi parent ko betiyon ko beta banane ki koshish nahi karni chahiye - kyonki us condition me woh na to idhar ki rah jayengi, na udhar ki. Na to ladka ban payengi, aur na hi sampurn nari rah payengi.