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Friday, January 27, 2012

SHOE:A MEDIUM OF EXPRESSION

पिछले दिनों कुछ ताजा तरीन घटनाओं से अनुतप्त हो सरकार ने सोशल नेटवर्किंग के माध्यमों पर रोक लगाने की पेशकश की। कहा गया कि फेसबुक या गूगल जैसे माध्यम सरकार की आलोचनात्मक टिप्पणियों पर सेंसरशिप लगाये या बन्द किये जाने के लिये प्रस्तुत हों। भारतीयों की जुगाड़ ढुंढने की कला ने सरकार के इस फरमान के तोड़ के लिये एक और चिर परिचित आजमाया हुआ अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम ढुंढ निकाला। इस माध्यम को बन्द करना भी अत्यन्त दुष्कर था। यह नया माध्यम था जूता या पादुका।
जूता परिधान का वह अंश है जो खुलने के बाद ही दिखता है। जूता अपनी सहज अवस्था में तो अद्दृश्य रह कर ही पांव को ढंकने का काम करता रहता है। हां असहज अवस्था में पांव से निकल जब हाथों में दृष्टिगोचर होता है तब किसी न किसी ढंके हुये को नंगा करने की भुमिका में अपना योगदान कर रहा होता है।
सर्वप्रथम जूते की भुमिका को त्रेता युगीन पौराणिक ग्रन्थ रामायण में वाल्मिकि ने चित्रित किया था। भरत अपने बड़े भाई राम की श्रद्धा में अवनत अयोध्या की राजगद्दी पर भाई राम चन्द्र्जी की पादुका या जूते को ही राम का प्रतीक बना, आसीन कर देते हैं। राम की पादुका के परोक्ष से स्वयम पास के गांव में रह, राज्य संचालन करते हैं।
आज कलयुग में भी भाइयों के कई ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे। अब अयोध्या की जगह मुम्बई को रख कर देख लीजिये। राजा यानि जिसका मुम्बई राज्य के लिये राज्याभिषेक हो रखा है, वह 14 वर्षों से बनवास या दुबई वास भोग रहें हैं, और मुम्बई में उनकी पादुका के परोक्ष से अन्य “भाई” उनके राज्य यानि मुम्बई का संचालन कर रहें हैं। यानि यहां जूता “भाई” भक्ति की अभिव्यक्ति है।
इस उपरोक्त समीकरण को महज variables बदल कर दिल्ली या इस्लामाबाद तक CURVE को extrapolate किया जा सकता है। धुरी या axis भी वही बनी रहेगी और सत्ता में जूते की भुमिका भी।
द्वापर युग में पहले तो श्री कृष्ण, पाण्दवों के यज्ञ के दौरान, आगन्तुकों के जूते सहेजते हैं और युग के अन्त में स्वयं जूता नहीं पहने,नंगे पांव होने के कारण एड़ी में तीर से आहत हो अपने प्राण गवांते हैं।
कलियुग एवं 21 वी सदी में जूता दो जगह दिखता है। मन्दिर के बाहर या किसी जिन्दा व्यक्ति के हाथ में। मन्दिर के बाहर जूता आपके अहं का प्रतीक है। जिस तरह आपको अपने अहं के साथ भगवान के दर्शन नहीं हो सकते उसी त्तरह जूता पहन कर आपको किसी भी मन्दिर के भगवान के दर्शन नहीं हो सकते। अतएव मन्दिर के बाहर पड़ा जूता व्यक्ति के अहं की अभिव्यक्ति है। जूता या अहं त्यागिये और प्रभु दर्शन से लाभान्वित होने के लिये कतार में आ जाइये।
जिन्दा व्यक्ति के हाथ का जूता इन दिनों काफी चर्चा में है। 21 वी सदी में जार्ज बुश से शुरु हुयी जूते की गाथा हमारे गृह मन्त्री पी सी चिदाम्बरम के पड़ोस से गुजरते हुये हाल में युवराज के सुरक्षा चक्र को भेदते हुये अपनी गण शक्ति को अभिव्यक्त कर गयी। यहां जूते की खासियत है कि इच्छित निशाने पर न लगने के बावजूद लक्ष्य भेदने में अर्जुन जैसी अचुक क्षमता है। पिछले दिनों चलाये हुये सारे जूतों की TRAJECTORIES अपने निशानों से दूर ही रहे।
इसके बावजूद भी इन चले हुये जूतों के mass communication की क्षमता अपार रही है। आवश्यकता है mass communication महाविद्यालय के पाठ्यक्रम में जूता चलाने की कला पर प्रशिक्षण देने की। इससे जनता जूता चलाने का RETURN ON INVESTMENT भली भांति आंक कर ही जूता चलाये। बुश पर चले हुये जूते के कीमत एक महानुभाव ने बीस लाख तक आंकी थी। कहते हैं कि जिन्दा हाथी लाख का तो मरा सवा लाख का ।इसी तरह पांव में पहना हुआ जुता कुछ सौ या हजार का लेकिन चल हुआ जूता कई लाख का। शोध का विषय है कि चलने के बाद जूते का सेंसेक्स इस बात पर निर्भर करता है कि लक्ष्य पर कौन था। यानि जूते की कीमत बाजार इस कसौटी पर आंकता है कि जूते की TRAJECTORY के निशाने पर कौन था। यहां पर कोई आरक्षण की प्रणाली भी नहीं है। लक्ष्य की TRP ही जूते की कीमत आंकती है। तभी तो बुश जैसे खास व्यक्ति पर चले जूते की कीमत 20 लाख और आम आदमी पर चले जूते की कीमत ?? आम आदमी पर जूता कौन चलाता ? उसे तो सिर्फ आधी रात को जूतों से रौन्द दिया जाता है। आम आदमी पर जूता चल जाये तो कम से उस कम बेचारे को नंगे पांव तो “इलाहाबाद के पथ पर पत्थर नहीं तोड़ने पड़ेंगे”।
कहते हैं कि “जाके पांव न फटी बवाई,वो क्या जाने पीर पराई”। आज 21वीं सदी में नेतागण से अपेक्षा रखें की जूते न पहनें और पांव में बवाई फटने दें ताकि वे जनता की पीर को समझ सकें, यह तो अन्याय है।ये बवाई का फटना और जनता की पीर समझना ये तो का नाटक के प्रथम चरण के सीन हैं। दूसरे अंक से तो पांव में जूते आ ही जाते हैं फिर काहे की फटी बवाई और काहे की जनता की पीर।
आज के नेता गण की एक और बेबसी है कि चरण रज तो जूतों के चलते अब रही नहीं । पहले किसी व्यक्ति के नेता बनते ही उसके चरण कमल हो जाते थे और उसकी चरण रज मात्र से जनता कृतार्थ हो जाती थी।। अब जूतों की रज से लोग आतंकित भले ही हो जायें कृतार्थ कोई नहीं होता।
एक बहु चर्चित पुरानी कहावत है कि जब बाप का जूता बेटे के पांव में आने लगे तो बाप को पुत्र के साथ मित्र वत व्यवहार आरम्भ कर देना चाहिये। इसी कहावत को आगे बढ़ाते हुये कहा जा सकता है कि अब जब जनता का जूता नेता के सुरक्षा चक्र तक आने लगा है तो नेताजी को भी मालिक का पद त्याग बकौल स्वामी विवेकानद “दासस्य दासम” का पद अख्तियार कर लेना चाहिये या दिग्गी राजा का सुझाव मान जूते पर भी फेसबोक सम बन्दिश लगा ही देनी चाहिये। अन्यथा इस एक अभिव्यक्ति के माध्यम की शक्ति अन्य सारे सोशल नेटवर्किंग माध्यमों से भारी पड़ेगी।
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Sunday, December 11, 2011

Freedom of Press

मैने कक्षा सात में एक निबन्ध लिखा था कि “साहित्य समाज का दर्पण होता है”। वह सन 1966 की बात थी। बचपन से ही हिन्दी में खासे लम्बे लम्बे निबन्ध लिखता था।
आज 2011 के भी अवसान का समय है। तकरीबन 45 साल के बाद श्री कपिल सिब्बल जी के वक्तव्य कि हमें यानि भारतीय सरकार को फेसबूक,व गूगल जैसी सोशल नेटवर्किंग वाली साइट्स पर नियन्त्रण की आवश्यकता है, सुनकर अपना वही 45 वर्ष पुराना निबन्ध याद हो आया। महामन्त्री जी कहते हैं कि इन साइट्स पर किसी समुदाय विशेष पर की गयी टिप्पणियां किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती हैं। मूलतः अल्पसंख्यक समाज की धार्मिक भावनाओं की रक्षा व ठेस लगने की अवस्था में उपजने वाली हिंसा का विषय प्रतीत होता है। चलो यहां तक तो सरकार पर सिर्फ अल्पसंख्यकों की तुष्टीकरण का दोष ही दिया जा सकता है। और यह तो भइ कांग्रेस की नीति तकरीबन् पिछले एक सौ वर्षों से रही है। जिन्ना के मना करने के बाद भी हमारे अत्यन्त आदरणीय गान्धी जी तक ने खिलाफत आन्दोलन का समर्थन सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिया किया था।
लेकिन आज तो फौरी मीडिया का युग है। कपिल सिब्बल जी के संवाद की स्याही सूखने के पहले ही गूगल का खुलासा आ जाता है कि पिछले एक वर्ष में भारतीय सरकर ने गूगल की साइट से जिन कथनों को आपत्तिजनक कह कर साइट्स से हटाने की मांग की थी, उनमें से 60% की वजह थी कि वे सरकार की आलोचना कर रहे थे व अन्य 10% किन्ही नेताओं की तथाकथित मानहानि कर रहे थे। धार्मिक विषयों पर की गयी टिप्पणियां जो सरकार की नजरों में आपत्तिजनक रहीं हैं,उनका आंकड़ा महज 2% का है। यानि कहीं पर तीर कहीं पर निशाना। सरकारी मंशा व सरकारी वक्तव्य में बहुत फर्क है। यह सीधे सीधे प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास है। औपचारिक मीडिया को “मैनेज” करना तो आसान है। आज के उपभोक्तावादी युग में हरे नोटों की गड्डियां व कुछ विशेष सुविधायें यथा सरकारी जमीन का मुफ्त के भाव में आंवटन या सी बी आई या एन्फोर्सेमेन्ट डाइक्टरेट का खौफ आदि द्वारा किसे नहीं खरीदा जा सकता। न्यायाधीश से लेकर सामाचार पत्र समूह के मालिक सब तय कीमतों पर अपना विवेक या अपनी चेतना गिरवी रखने को तैयार है। हकीकत भी यही है कि आज भारत में पैसों द्वारा खारीदा जा सकने वाला सर्वश्रेष्ठ मीडिया है। फिर चाहे वह प्रिन्ट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया सबने बोलियां लगा रखी हैं।
इन्टरनेट व सोशल नेटवर्किंग साइट्स तो चौपाल है। यह एक मात्र वह मीडिया है जो आम आदमी की बात को बिना किसी लाग लपेट या मुलम्मे के बेलाग कहता है। चुंकि इस मीडिया की दरफ्त में करोड़ों की संख्या में लोग आते हैं, इसे खरीदा नहीं जा सकता। सिर्फ बन्द किया जा सकता है। पिछले दिनों पाकिस्तान ने भी फेसबुक पर कुछ समय के लिये रोक लगा दी थी। वहां तो फिर भी धार्मिक भावनाओं का प्रश्न था ,हज़रत मोहम्मद साहब की तस्वीर बनाने का मुद्दा था। यहां तो सिर्फ आइना दिखाने का मुद्दा था अब कपिल साहब नहीं नहीं उनके आकाओं को (कपिल साहब तो महज HMV हैं)समाज की ये हिमाकत बर्दाश्त नहीं हुई और दर्पण में दिखने वाली छवि पसन्द नहीं आई तो छवि को सुधारने के प्रयास की जगह दर्पण को तोड़ना अधिक सहज लगा।
आजादी की बेला यानि 15 अगस्त को गान्धी जी ने स्वाधीनता की परिभाषित करते हुये कहा था कि “स्वाधीन होने का अर्थ यह नहीं है कि सत्ता गोरों के अपेक्षा कालों के हाथ आजाये। वरन किसी भी गलत के विरोध करने की एक इकाई की क्षमता ही उसकी स्वाधीनता है।“
महाथीर मोहम्मद (इन्डोनेशिया के राष्ट्रपति) का वक्तव्य की भारत में गणतन्त्र की मात्रा चीन से अधिक होने के कारण भारत की प्रगति चीन की तुलना में कम हो रही है को एक साथ पढ़ने से एक द्वन्द सा मन में उठता है कि, क्या यह गणतन्त्र की व्यवस्था ही गलत है।
इसके उत्तर में मुझे द्वितीय विश्व युद्ध के सक्षम नेता श्री विन्सटन चर्चिल की उक्ति सहज ही उभर आती है कि “गणतन्त्र एक निहायत ही बेकार व बेहुदा किस्म का सरकारी ढांचा है लेकिन इसके बावजूद यह आज तक के अन्य सारे आजमाये हुये प्रशासनीय ढांचों से फिर भी कही बेहतर है”।
कुल निष्कर्ष यह है बहुदलीय गणतन्त्र की कुछ कीमते हैं। यहां हर इकाई को अलग अलग कर गिनना या उसकी सहमति का महत्व है। हमारे संविधान में इस स्वतन्त्रता की समुचित व्यवस्था है,व इसके साथ साथ स्वतन्त्रता के नाम पर उच्छृंखलता करने वालों के लिये दण्ड का भी सहज प्रावधान है। महाथीर जी के वक्तव्य की सच्चाई को आंकने के लिये कुछ गहराई में उतरना पड़ेगा। हां भारत में प्रगति की दर में गणतन्त्र कहीं कहीं बाधक होता रहता है। गणतन्त्र का अर्थ ही हर एक इकाई को अपनी बात कहने का अधिकार है और प्रशासन को उसकी बात सुनने की जिम्मेदारी। मेधा पाटकर अगर किसी प्रोजेक्ट के विषय में कुछ कहती है तो प्रशासन उसकी बात सुनने को बाध्य है।सिर्फ बहुमत द्वारा शासन गणतन्त्र नहीं होता।
मीडिया अगर सरकार की आलोचना कर रहा तो सरकार के लिये प्रसन्नता का विषय है कि मीडिया आजाद है। स्वतन्त्र मीडिया अच्छा या बुरा कुछ भी हो सकता है,लेकिन जो मीडिया स्वतन्त्र नहीं है,वह महज् बुरा ही होता है।
अभी टीवी पर अकबर जोधा आ रही थी,व कीबोर्ड पर यह ब्लोग चल रहा था॥दोनो के संयोग से एक बात जो उभर कर आयी वह यह है कि संविधान गणतन्त्र को जन्म जरुर देता है लेकिन प्रेस की स्वतन्त्रता ही गणतन्त्र की दाई मां (फिल्म जोधा अकबर का एक मुख्य किरदार) होती है। गणतन्त्र को जिन्दा रखने का सारा दारोमदार इसी प्रेस की स्वतन्त्रता नामक दाई मां पर ही होता है। सिब्बल साहब दर्पण को तोड़ देने से महज “FAIREST OF THE ALL” का भ्रम पाला जा सकता चेहरे पर लगी स्याही नहीं मिटती। सन् 75 के आपातकाल को दोहराने का प्रयास न करें।इसका परिणाम सन् 77 में ही भुगतना पड़ गया था।
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