मेरे सारे ब्लाग्स सारे जहां के विषय में थे।कभी राजनीति पर कभी धर्म पर ।
आज कुछ मानवीय सम्बन्धों पर लिखने की इच्छा हुई।मैं एक Mid aged पचासोत्तर उम्र का मारवाड़ी व्यवसायी हूं। मैं आज उम्र के जिस पड़ाव पर हूं, उस पड़ाव पर मेरे प्रायः हमउम्र मित्रों के पुत्र वयस्क हो चुके हैं ,एवं पारिवारिक व्यसाय में रत हैं।
इन समीकरणों मे अक्सर एक असंतोष देखने में आता है। कहीं पिता को पुत्र पर पूरा भरोसा नहीं है एवं पुत्र पांच या दस वर्षों के बाद भी Learning License वाली driving ही कर रहें हैं। कहीं पुत्र परिवर्तन चाहते हैं एवं पिता अपने पुराने Tried एवं Proven मार्ग से हिलने को तैयार नहीं हैं।
कारण कुछ भी हों,सम्बन्ध अक्सर तनाव मय हैं।
यह सब देख कर अक्सर प्रतीत होता है कि मैं खुशकिस्मत हूं कि मेरे कोई बेटा नहीं है,सिर्फ दो बेटियाँ हैं। सिर्फ कहना गलत है। सिर्फ कहीं न कहीं न्यूनता का भाव प्रदर्धित करता करता है। यहां तो बाहूल्य का मौसम है।
प्रधान मन्त्री श्री मनमोहन सिहं ने भी कुछ ऐसे ही भाव व्यक्त किये थे ,जब उन्हों कहा था कि "वे खुशकिस्मत हैं कि उनकी तीन बेटियां हैं कोई बेटा नहीं है। अगर उनके कोई बेटा होता तो वो कभी भी प्रधान मन्त्री नहीं बन सकते"।
स्वाभाविक तौर पर मेरे ढेर सारे अनुभव हैं इन बेटियों के बचपन के, किशोरवस्था के आदि।
मुझसे किसी व्यक्ति ने एक दिन कहा कि आपने अपनी बेटियों को बेटों की तरह पाला है। मैं चौंक गया कि, कहां चूक हो गयी। मेरा उत्तर था कि भाई साहब मुझे तो एक ही तरह से पालना आता है। बताइये कहां चूक हो गयी। पता लगे तो अब भी भूल सुधार कर लूं।
एक और शुभचिन्तक हितैषी अतिथि के रुप में घर आये थे। कहने लगे कि बेचारे कुलदीप के तो सिर्फ बेटियां हैं।कोई बेटा नहीं है। मुझे और मेरी वहां उपस्थित बेटियों को बेचारा शब्द बहुत नागावार गुजरा। अब अतिथि धर्म के सामने बहुत कुछ कहा भी नहीं जा सकता। मैं उनकी भावनाओं को भी समझ रहा था। फिर भी मैंने तुरन्त बेचारा शब्द पर ऐतराज करते हुये पूछा कि मैं कहां से उन्हें से बेचारा नजर आगया।अच्छा खासा व्यसाय चला रहा हूं। कभी मांगने के लिये हाथ नहीं उठाया। मेरी बेटियां मुझे तो अति प्रिय हैं। तो कमी कहां और बेचारगी कहां है।
प्रश्न है एक सही व्यक्तित्व के निर्माण का। फिर चाहें वे इन्दिरा नूयी बनें या सहज गृहणी कोई फर्क नहीं पड़ता।